अधिगम के सिद्धांत

अधिगम के सिद्धांत Theory Of Learning in hindi

अधिगम के सिद्धांत
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अधिगम के सिद्धांत Theory Of Learning in hindi!! अधिगम जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया होती है अधिगम का अर्थ होता है सीखना। मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षणों में कुछ ना कुछ सीखता रहता है सीखने की यह प्रगति मनुष्य में जीवन पर्यंत चलती रहती है मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान के अंतर्गत कुछ अधिगम के सिद्धांत Theory Of Learning in hindi दिए हैं जो निम्नलिखित है-

1. उद्दीपक अनुक्रिया सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ए एल थार्नडाइक ने किया था। इस नियम के अनुसार,” जब प्राणी के समक्ष कोई उद्दीपक उपस्थित होता है तब वह उसके प्रति अनुक्रिया करता है, परिणाम संतोषजनक प्राप्त होने पर वह अनुक्रिया उद्दीपक के साथ जुड़ जाती है।”
इस सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए थार्नडाइक ने बिल्ली पर प्रयोग किया।

इस प्रयोग के पश्चात थार्नडाइक ने सीखने के क्षेत्र में तीन मुख्य नियमों का प्रतिपादन किया-
1. तत्परता का नियम
2. अभ्यास का नियम
3. प्रभाव का नियम

थार्नडाइक ने उपरोक्त मुख्य नियमों के अलावा पांच गौण नियमों का भी प्रतिपादन किया है-
1. बहु अनुक्रिया का नियम
2. आंशिक क्रिया का नियम
3. मनोवृति का नियम ( रुचि का नियम)
4. सादृश्यता का नियम ( पूर्व अनुभव का नियम)
5. साहचर्य रूपांतरण का नियम

प्रश्न- थार्नडाइक का कौन सा नियम पूर्व अनुभव पर आधारित होता है?
उत्तर- सादृश्यता का नियम
प्रश्न- प्रयास एवं त्रुटि सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर- थार्नडाइक

2. अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन रूस के शरीर शास्त्री इवान पी पावलाव ने किया है। इस सिद्धांत के अनुसार,” जब प्राणी के समक्ष कोई उद्दीपक उपस्थित होता है, तो वह उसके प्रति अनुक्रिया करता है यदि प्राणी के समक्ष प्रथम उद्दीपक के साथ-साथ कोई दूसरा उद्दीपक भी प्रस्तुत किया जाए और इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाए तो दूसरा उद्दीपक प्रथम उद्दीपक का स्थान ले लेता है और प्राणी जो अनुक्रिया प्रथम उद्दीपक के प्रति करता था वही अनुक्रिया दूसरे उद्दीपक के प्रति करने लगता है”। अर्थात उस दूसरे उद्दीपक और अनुक्रिया के मध्य अनुकूलन स्थापित हो जाता है।

इस सिद्धांत के प्रतिपादक के लिए पावलाव ने कुत्ते पर प्रयोग किया।
इस सिद्धांत को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक है-
1. पुनर्बलन ( भोजन)
2. अभ्यास
3. समय

इस सिद्धांत के अंतर्गत सीखने के क्षेत्र में पावलव ने कुछ नियमों का प्रतिपादन किया जो निम्नलिखित हैं-

1. उत्तेजना का नियम
2. उद्दीपक सामान्यीकरण
3. उद्दीपन विभेदीकरण
4. विलोपन
5. स्वत: पुनर्लाभ

3. क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धांत (R-S Theory)

इस का प्रतिपादन स्किनर ने किया है क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धांत के अनुसार,” उद्दीपक नहीं तो अनुक्रिया नहीं, सिद्धांत को मानवों के ऊपर लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि मानव वातावरण का गुलाम बनकर नहीं रहता वह अपने पहल से वातावरण को अपने अनुकूल बनाने का सतत प्रयास करता रहता है”।

स्किनर ने सीखने की व्याख्या दो रूपों में की-
(A) प्रतिक्रियात्मक व्यवहार ( किसी पर भी लागू)
(B) क्रिया प्रसूत व्यवहार ( मानव)

प्रतिक्रियात्मक व्यवहार उद्दीपक के नियंत्रण में होता है जबकि क्रिया प्रसूत व्यवहार प्राणी की इच्छा पर निर्भर करता है स्किनर ने चूहों तथा कबूतरों पर अनेक प्रयोग किए। चूहे पर प्रयोग के लिए इन्होंने क्रिया प्रसूत अनुबंधन कक्ष का निर्माण किया जिसका नाम बाद में स्किनर बॉक्स रख दिया।

4. गेस्टाल्ट सिद्धांत/ सूझ या अंतर्दृष्टि सिद्धांत

गेस्टाल्ट शब्द जर्मन भाषा का शब्द है इसका आंग्ल भाषा में समानार्थी शब्द ना मिलने के कारण इसे इसी रूप में स्वीकार कर लिया गया है। गेस्टाल्ट शब्द से आशय समग्रता या संपूर्णता से लगाते हैं।
गेस्टाल्ट वादियों का मानना है कि “बुद्धिमान प्राणी किसी समस्या के उत्पन्न होने पर तुरंत अनुक्रिया नहीं करता हैं बल्कि उस समस्या को समझने का प्रयास करता हैं और जैसे ही अचानक उस समस्या की सूझ उस प्राणी के मस्तिष्क में आती है, वह क्रियाशील हो जाता है”।

इस सिद्धांत के प्रतिपादक के लिए कोहलर ने सुल्तान नामक चिंपांजी ( वनमानुष) पर चार प्रयोग किए हैं। अधिगम के क्षेत्र में सूझ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कोहलर ने किया है।

5. जीन पियाजे का संज्ञानात्मक सिद्धांत

जीन पियाजे का जन्म स्विट्जरलैंड में हुआ था, इन्होंने अपने शुरुआती दिनों में बिने के साथ बुद्धि परीक्षण पर भी कार्य किया था।
छोटे-छोटे बच्चे अपने आसपास के बाहरी जगत में किस प्रकार से ज्ञान अर्जित करते हैं, यह जानने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने अपने ही बच्चों पर प्रयोग किया और प्रयोग के आधार पर लगभग 400 पुस्तकों तथा लेखों को प्रकाशित किया।

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक कार्यविधि की दो प्रक्रियाएं हैं-
1. संगठन
2. अनुकूलन

1. संगठन- संगठन से तात्पर्य बौद्धिक सूचनाओं के संगठन से हैं जब यह सूचनाएं मस्तिष्क में संगठित हो जाती है तो संरचनाओं का निर्माण होता है।

2. अनुकूलन- अनुकूलन से तात्पर्य नवीन ज्ञान तथा पूर्व अनुभवों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने से है। अनुकूलन के अंतर्गत दो प्रक्रियाएं होती हैं (A) आत्मसात करण (B) समाविष्टीकरण

आत्मसात करण की प्रक्रिया में पूर्व अनुभव एवं नवीन अनुभव के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए नवीन अनुभव को पूर्व अनुभव के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है।

समाविष्टीकरण की प्रक्रिया में नवीन अनुभव एवं पूर्व अनुभव के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए नवीन अनुभव में कोई नई जानकारी जोड़कर दोनों में अंतर करते हैं इसी प्रकार अंतर करने की प्रक्रिया के दौरान सही जानकारी प्राप्त होती है।

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएं बताई है-

1. संवेदी पेशीय अवस्था ( जन्म से 2 वर्ष)
2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( 2 से 7 वर्ष)
3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 7 से 11 वर्ष)
4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था ( 11 से 15 वर्ष)

1. संवेदी पेशी अवस्था

यह संज्ञानात्मक विकास की प्रथम अवस्था है इस अवस्था के दौरान बालक देखना, सुनना पकड़ना, चूसना ,एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचना इत्यादि का अनुभव प्राप्त कर लेता है। इसे इंद्रिय जनित गामक अवस्था भी कहते हैं।

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था

यह संज्ञानात्मक विकास की द्वितीय अवस्था है इसे दो भागों में विभाजित किया गया है

(A) पूर्व प्रत्यात्मक अवस्था ( 2 से 4 वर्ष)
(B) अंत प्रज्ञकाल ( 4 से 7 वर्ष)

पूर्व प्रत्यात्मक अवस्था को परिवर्तन तथा खोज की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था के दौरान बालक के अंदर संकल्पना निर्माण की क्षमता नहीं पाई जाती। लगभग 2 वर्ष का बालक 200 शब्दों को समझ लेता है 3 वर्ष का बालक 3 से 10 शब्दों के वाक्य बना लेता है।

अंतप्रज्ञकाल से तात्पर्य बिना किसी तार्किक विचार के ही किसी वस्तु अथवा बात को स्वीकार कर लेने से है। इस अवस्था के दौरान बालक वस्तुओं की संरचनाओं में होने वाले परिवर्तन से भ्रमित हो जाता है क्योंकि उसके अंदर विचारों का अभाव पाया जाता है।

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था

यह संज्ञानात्मक विकास की तीसरी अवस्था है इस अवस्था के दौरान बालक मूर्त वस्तुओं से संबंध स्थापित करना प्रारंभ कर देता है। बालक वस्तुओं को गिन सकता है, माप सकता है ,तौल सकता है तथा 2 वस्तुओं के मध्य तुलना कर सकता है। इस अवस्था के दौरान बालक तीन गुणात्मक योग्यताओं में निपुण हो जाता है-
(A) विचारों की विलोमियाता
(B) क्रमबद्धता
(C) संरक्षण

4. औपचारिक संक्रिया अवस्था

यह अवस्था किशोरावस्था से जुड़ी होती है इस अवस्था के दौरान बालक में सोचने समझने तथा तर्क करने की योग्यताएं आने लगती हैं अब वह वास्तविक जगत से परे संभावनाओं के बारे में सोचना प्रारंभ कर देता है अर्थात अमूर्त चिंतन करना प्रारंभ कर देता है।

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