युवा पीढ़ी पर स्मार्टफोन का बुरा असर Bad Effect of smartphone on younger generation

आज हम ऐसी पीढ़ी में जी रहे हैं जहां पर स्मार्टफोन लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन गया है। लोग चौबीसों घंटे अपने स्मार्ट फोन की स्क्रीन में आंखें गड़ाए रहते हैं। स्मार्टफोन पर लोगों को मनोरंजन,सूचनाएं ,देश विदेश की खबरें पल भर में प्राप्त हो जाती हैं। आपने “कर लो मुट्ठी दुनिया में” वाला विज्ञापन तो सुना होगा वाकई स्मार्टफोन के द्वारा पूरी दुनिया को मुट्ठी में किया जा सकता है।

स्मार्टफोन

आज आप सारी बैंकिंग, वित्तीय कामकाज मोबाइल फोन के द्वारा करते हैं। अपने विचारों को सोशल मीडिया के सहारे दूसरों तक पहुंचा सकते हैं और गपशप कर सकते हैं। खाना ऑर्डर करने से लेकर खरीदारी, रेलवे और हवाई जहाज की टिकट बुक करना, जैसे कार्य अपने स्मार्टफोन से कर सकते हैं।

लेकिन रुकिए दोस्तों! क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया केवल वही है जो हमारे स्मार्टफोन इस्तेमाल करने से बनती है। टिकट बुक कर लेना, होटल से ऑनलाइन खाना मंगवा लेना, टैक्सी बुक कर लेना, खबरें जान लेना ,ऑनलाइन भुगतान कर लेना क्या इन्हीं सब चीजों तक हमारी दुनिया सीमित है?

इन सब चीजों पर विचार करने की आवश्यकता है। विचार करने के बाद हम यह जान पाते हैं कि हम मोबाइल फोन को नहीं बल्कि मोबाइल हमको चला रहा है। हमारी सोच केवल एक मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो गई है हम यह भूल जा रहे हैं कि इससे बाहर भी कोई संसार है जिसमें संवेदनाएं हैं, प्यार है, सहानुभूति है और दया है।

हमें जो समय अपने परिवार के साथ व्यतीत करना चाहिए उसे हम सोशल मीडिया में व्यतीत कर रहे हैं। हमारा जीवन बिल्कुल इकहरा हो गया है। हम जिस दुनिया को मुट्ठी में भरना चाहते हैं शायद वह दुनिया हमारी मुट्ठी से फिसल रही है। आज हमें कुछ भी जानकारी प्राप्त करनी होती है तो हम उसे गूगल में खोज लेते हैं हम इसे स्वयं से खोजने की कोशिश ही नहीं करते। इससे हमारी स्मृति, हमारा अनुभव कमजोर होता है।

इस स्मार्टफोन के युग में तात्कालिकता पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है। लोग हर खबर को सबसे जल्दी देखना चाहते हैं, हम उस पर ठीक से विचार तक नहीं कर पाते हैं कि दूसरी त्रासदी चली आती है। हमारी स्मृति में कुछ नहीं टिकता है इससे हमारे अनुभव में कुछ नहीं जुड़ता।

अक्सर हम किसी पर्यटक स्थल में घूमने जाते हैं तो वहां पर उस स्थल को ठीक से बाद में देखते हैं पहले उसकी तस्वीर खींचकर सोशल मीडिया में अपलोड करते हैं। हम ना ही किसी पहाड़ में जाकर हवा के थपेड़ों का आनंद लेते हैं ना ही पेड़ पौधों एवं प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हैं। यह सब देखने की फुर्सत किसे है? बस हम सेल्फी लेने में जुड़ जाते हैं।

गांधीजी इस रफ्तार को बहुत आलोचना निगाह से देखा करते थे। उन्होंने एक किताब ‘फैलेसी आफ स्पीड’ के जरिए बताया था कि अगर आप किसी जंगल में टहलते हैं तो जंगल आपको सुंदर ,हरा भरा एवं मित्रवत लगता है। लेकिन अगर उस जंगल में आप दौड़ने लगेंगे तो आपको हर पेड़ पौधा, हर फूल अपने रास्ते की रुकावट महसूस करेगा। यही रफ्तार चीजों से हमारा रिश्ता बदल देती है।

महात्मा गांधी ने यह भी कहा था कि आज ट्रेनों ने हमको अजनबी बना दिया है पहले के समय में लोग पैदल मीलों चलते थे इससे उनका शारीरिक व्यायाम तो होता ही था इसके अलावा लोग हर जगह को देखते ,समझते तथा आत्मसात करते थे। आज लोग पल भर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाते हैं।

आइए अपने मुद्दे पर लौटते हैं। स्मार्टफोन ने हमें पराया बना दिया है। हमने वास्तविकता में जीना छोड़ दिया है। जो हमें सोशल मीडिया में दिखता है उससे ही सत्य मान लेते हैं चाहे वह सत्य हो या ना हो।

इसी के चलते हम झूठी खबरों के शिकार हो जाते हैं। झूठी खबरें हमारी संस्कृति ,सभ्यता ,आचार- विचार को प्रभावित करती हैं। यह खबरें आपके अंदर की सकारात्मकता को नष्ट करती हैं। यह खबरें आपके अंदर द्वेष, धार्मिक उन्माद, हिंसा जैसी बुराइयों को जन्म देती है।

स्मार्टफोन के ज्यादा प्रयोग से आंखें प्रभावित होती हैं। इससे अनिद्रा ,चिड़चिड़ापन ,मानसिक विकार ,सिर दर्द, शरीर में दर्द ,इंफेक्शन ,भ्रम जैसी बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

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